Poetry

इबादत कि कस्म

फिर मिलना था शायद
ये ऎसा ही लिखा था
उलछने सुलछेगी
ऎसा न सोचा था
चाहा था तुझे
जिस शिद्दत से
उस इबादत कि कस्म
तुझे पाने का
तब भी न सोचा था
तेरी खुशी में
खुशी ढूंढी मैने
इससे ज्यादा मेरा
कोई इरादा न था
आज मिल कर
फिर चले जाये शायद
पर तुझे तन्हा देखने का
ये बहाना न था

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