Poetry

जहां

गुम-गुम सा
सुन-सुन सा
सारा जहां लगता है
अब बेगाना-सा
ये घर संसार लगता है
बाजारो की भीड़ मे घुटता
ये इंसान लगता है
अब तो अपना
भी पराया लगता है
खो जाने वाली भीड़ मे
तन्हां-सा मकान लगता है
बन्दिशो मे बन्धा है  जहां
उस कुँए से
छोटा-सा आसमा लगता है
गुम है यहाँ सारी दिशाएं
गोल-सा सारा जहां लगता है
प्यार के इन्तजार मे
प्यासा सारा जहां लगता है
घुँआ-ही-धुँआ है यहाँ
मौत का ताडंव लगता है
मौत भी क्या मौत दे
जिन्दा लाशो का ढेर लगता है
चाबी  भरकर चलता-सा
ये पुरा जहां लगता है।

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