Poetry

अश्क तेरे नाम का

 

मेरे जेहनो-दिमाग़ पर
हर पल कुछ यू
तेरे यादो का
पहरा सा है |
देख ले आ कर
ए-ज़ालिम-आशुफ्ताक
एक और अश्क
तेरे नाम का है |

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नहीं आता

न हिंदी आती है
न उर्दू आती है
न कोई और भाषा
आता है तो बस
इन कागजो पर
हाल-ए-दिल बया करना|

न तोल तू मेरे
इन लफ्जो को
इस दुनिया की भाषा से
इस जुबा को तो
ठीक से “श”
कहना भी नहीं आता|

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चाहती हूँ..

तेरी सीने पे सर रख
इन तन्हाइयो को
भूलना कहती हूँ |
ले चल ऐ मुसाफिर
हमे भी तेरे साथ
उस राह पे
चलना चाहती हूँ |
मुझे थोड़े से
पर दे दे
ऐ ज़ालिम
उस आसमान को
मै भी
छूना चाहती हूँ |
किनारे पे बैठी हूँ
इस इश्क के
सैलाब में
डूबना चाहती हूँ |

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बस अब तुम हो

तुम हो, तुम हो
बस अब तुम हो

हंसी तुम हो
खुशी तुम हो
मेरे दिल की
अब लगी तुम हो
लगी है ऐसी की
अब सुलझती नहीं है|

आसमा तुम हो
धरा तुम हो
मेरे दिल का
अब नशा तुम हो
नशा है ऐसा की
अब उतरता नहीं है|

तुम हो, तुम हो
बस अब तुम हो

खलिश तुम हो
कशिश तुम हो
मेरे दिल की
अब तपिश तुम हो
तपिश है ऐसी की
अब बुझती नहीं है|

अरज तुम हो
कर्ज तुम हो
मेरे दिल का
अब मर्ज तुम हो
मर्ज है ऐसा की
जिसके दवा नहीं है|

तुम हो, तुम हो
बस अब तुम हो…
बस अब तुम हो…

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तेरे इश्क़ मे

तेरे इश्क़ मे हम, लो से जल जाते है,
तेरे छूते ही हम, मोम से पिघल जाते है|
आता नहीं तुझे चाहने के अलावा अब हमें कुछ और,
तेरे इंतजार में हम, श्याम से ही जग जाते है|

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मान लिया हमे प्यार नहीं है

बरसो के इंतज़ार के बाद
ये नज़र आज
तुझ पर आकर रुकी है
बरसो से छुपि
दिल्लगी तुझ पर
आकर लगी है
और तुम कहती हो
ये प्यार नहीं है|

तमन्नाओं का सैलाब
छूट गया है
आँखो में एक ओर
ख़्वाब घूम गया है
तेरे आने के नाम से
दिल फिर झूम गया है
और तुम कहती हो
ये प्यार नहीं है|

बरसो से मन बसी
तस्वीर को आज
तेरा चेहरा मिला है
मेरे अरमानो को
तेरा पता मिला है
और तुम कहती हो
ये प्यार नहीं है|

माना लिया तुझे
एतबार नहीं है
मान लिया हमे
प्यार नहीं है
पर इन अहसासों को
यु बे पर्दा न कर
और यू कह-कर
मुँह फेरा न कर
की ये प्यार नहीं है|
की ये प्यार नहीं है|

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नहीं सकते

064-mustsee-digital-art-elena-dudinaतुझे पा भी नहीं सकते
तुझे जान भी नहीं सकते
तेरे लिए इन साँसों को
रुका भी नहीं सकते
फिर भी कमबख्त
कोई साँस
रूक ही जाती है
तेरे नाम पे |

तेरे लिए रो भी नहीं सकते
तेरे लिए हँस भी नहीं सकते
तेरे लिए इस दिल को
धड़का भी नहीं सकते
फिर भी कमबख्त
कोई धड़कन
धड़क ही जाती है
तेरे दीदार पे |

तुझे टूट कर
चाह भी नहीं सकते
तुझे उस रब से
मांग भी नहीं सकते
फिर भी कमबख्त
सजदे-ए-दुआ मे कोई
फरियाद आ ही जाती है
तेरे अहसास पे |

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भूल गयी मै

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भूल गयी मै
उस चाहत को
उस इबादत को
भूल गयी मै
उस तड़प को
उस कशिश को
भूल गयी मै
हां भूल गयी
उस मदहोशी को
उस ख़ामोशी को
तेरे आने का एहसास
तेरे मुलाकात
का इंतजार
भूल गयी मै
हां भूल गयी

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लिखे है मैंने

let-goकुछ लम्हें
कुछ पल
कुछ अहसास
लिखे है मैंने,

तेरे आँखों मे पढ़ी
किस्सो के कहानी
लिखी है मैंने,

तेरे हंसी की झंकार
से हुई दिल की कशिश
लिखी है मैंने,

लिखी है वो रात
लिखी है वो बहार
लिखे है तेरे मेरे
दिल के जज्बात,

लिखे है मैंने
लिखे है मैंने

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तू नहीं तो तेरे याद सही

la_con10कोई पल कोई दिन ऐसा नहीं
जब तेरे लिए सोचा नहीं
जिस दिन तेरा दीदार नहीं
उस दिन नींद दुश्वार नहीं|

तू साथ नहीं तेरा नाम सही
तेरे दीदार का हर पल इंतजार सही
हम होश मे नहीं ऐसे बदहाल सही
बिन पिंजरे की तेरी कैद सही|

कोई ख्वाब अब तेरे बिन साथ नहीं
तेरे आने की आहट पर मदहाल सही
तू नहीं तो तेरे याद सही|
तू नहीं तो तेरे याद सही|

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तन्हाईया

dangerous-loneliness

तन्हाइयों से अब
दोस्ती सी हो गयी,
दोस्ती ये अब
गहरी सी हो गयी,
सीख लिया हमने
तन्हा रहना भी,
तन्हाइयों की दुनिया से अब
अलग सी यारी हो गयी,
जो अपने है उन से
मैं बेगानी सी हो गयी,
बेगानों मे अपनों की
कहानी सी हो गयी,
निकलती है इस फलक पर
धुप आज भी,
पर अंधेरो से हमारी
पहचान पुरानी सी हो गयी|

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मै कोई कवि नहीं

p.lozd.comमै कोई कवि नहीं और
ये सिर्फ़ कविता नहीं।
कुछ सार है जीवन के,
एक तार है मन का।
कुछ रस है जीवन के,
एक मस है मन का।
कुछ पल है जीवन के,
एक दर्द है मन का।
कुछ चाह है जीवन की,
एक आह है मन की।
कुछ दुविधा है जीवन की,
एक हल है मन का।
कुछ सोच है जीवन की,
एक मंथन है मन का।
कुछ ज्वाला है जीवन की,
एक सैलाब है मन का|
कुछ यादे है जीवन की,
एक अहसास है मन का।
बस कुछ,
यादो को संजोया है।
शब्दों को पिरोया है।।

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उठती है पिड़ा

उठती है पिड़ा
अपनी हसरतों की मय्यत पे
अरे! आलम तो देखो
रो भी नही सकते
टुटे ख्वाबो के मकान पे
जानते है हम की
जीती है दुनियां
इससे बुरे हालात में
फिर भी
तिल-तिल मरती हुँ
अपने हिजाब में।

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तुझे जो देखा इतने करीब से

तुझे जो देखा
इतने करीब से
लगा की जैसी
साँसे थम गयी।

अचानक रूबरू
हुई जो तुझसे
लगा की जैसे
धड़कन बढ़ गयी।

सुना जो मेरा नाम
तेरे जुबान से
लगा की जैसे
लहू जम गयी।

तुने जो बढ़ाया हाथ
एक मुबारक देने
लगा के जैसे
कायनात बदल गयी।

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रात भी धोखा दे जाती है

हम बोला करते थे
दिन कभी साथ नही देता
रात कभी धोका नहीं देती
अब तो रात भी
धोखा दे जाती है
हमारी सोने से
पहले ही चली जाती है
दिन फिर चला आता है
एक नया इन्तेहां लेकर
कहता है कितना ढूंढेगी
ढूंढ कर देखा
रात कहती है
कितना जागेंगी
जाग कर देखा
अब तो आलम ये है
हर कोई तो इन्तेहां लेता है|