Poetry

उठती है पिड़ा

उठती है पिड़ा
अपनी हसरतों की मय्यत पे
अरे! आलम तो देखो
रो भी नही सकते
टुटे ख्वाबो के मकान पे
जानते है हम की
जीती है दुनियां
इससे बुरे हालात में
फिर भी
तिल-तिल मरती हुँ
अपने हिजाब में।

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