Poetry

तू नहीं तो तेरे याद सही

la_con10कोई पल कोई दिन ऐसा नहीं
जब तेरे लिए सोचा नहीं
जिस दिन तेरा दीदार नहीं
उस दिन नींद दुश्वार नहीं|

तू साथ नहीं तेरा नाम सही
तेरे दीदार का हर पल इंतजार सही
हम होश मे नहीं ऐसे बदहाल सही
बिन पिंजरे की तेरी कैद सही|

कोई ख्वाब अब तेरे बिन साथ नहीं
तेरे आने की आहट पर मदहाल सही
तू नहीं तो तेरे याद सही|
तू नहीं तो तेरे याद सही|

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मै कोई कवि नहीं

p.lozd.comमै कोई कवि नहीं और
ये सिर्फ़ कविता नहीं।
कुछ सार है जीवन के,
एक तार है मन का।
कुछ रस है जीवन के,
एक मस है मन का।
कुछ पल है जीवन के,
एक दर्द है मन का।
कुछ चाह है जीवन की,
एक आह है मन की।
कुछ दुविधा है जीवन की,
एक हल है मन का।
कुछ सोच है जीवन की,
एक मंथन है मन का।
कुछ ज्वाला है जीवन की,
एक सैलाब है मन का|
कुछ यादे है जीवन की,
एक अहसास है मन का।
बस कुछ,
यादो को संजोया है।
शब्दों को पिरोया है।।

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उठती है पिड़ा

उठती है पिड़ा
अपनी हसरतों की मय्यत पे
अरे! आलम तो देखो
रो भी नही सकते
टुटे ख्वाबो के मकान पे
जानते है हम की
जीती है दुनियां
इससे बुरे हालात में
फिर भी
तिल-तिल मरती हुँ
अपने हिजाब में।

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रात भी धोखा दे जाती है

हम बोला करते थे
दिन कभी साथ नही देता
रात कभी धोका नहीं देती
अब तो रात भी
धोखा दे जाती है
हमारी सोने से
पहले ही चली जाती है
दिन फिर चला आता है
एक नया इन्तेहां लेकर
कहता है कितना ढूंढेगी
ढूंढ कर देखा
रात कहती है
कितना जागेंगी
जाग कर देखा
अब तो आलम ये है
हर कोई तो इन्तेहां लेता है|

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तू यूँ खफा न होता

हँसते है हम
जब तू रोता है
पर हम हँसते है
क्यों की
तुम कहते थे
तुम हँसती हो तो
मैं सब गम भूल जाता हूँ
इतनी बात जान ली होती
तू यूँ खफा न होता

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मोहब्बत कम पड़ गई

चाहा उसे इतनी शिद्ददत से
कि चाहत कम पड़ गई
और वो कहते की हमारी
उल्फत-ए-मोहब्बत कम पड़ गई।

सूखी रही दिल की राहें
प्यासी रही दिले-ए-तमन्ना
और वो कहते है कि मैं
समुद्र-ए-मोहब्बत लुट गई।

खाक हो गई ये खाकसार
इज्हार-ए-महोब्बत में
और वो कहते है की हमारी
नमाज़-ए-मोहब्बत कम पड़ गई।

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जहां

गुम-गुम सा
सुन-सुन सा
सारा जहां लगता है
अब बेगाना-सा
ये घर संसार लगता है
बाजारो की भीड़ मे घुटता
ये इंसान लगता है
अब तो अपना
भी पराया लगता है
खो जाने वाली भीड़ मे
तन्हां-सा मकान लगता है
बन्दिशो मे बन्धा है  जहां
उस कुँए से
छोटा-सा आसमा लगता है
गुम है यहाँ सारी दिशाएं
गोल-सा सारा जहां लगता है
प्यार के इन्तजार मे
प्यासा सारा जहां लगता है
घुँआ-ही-धुँआ है यहाँ
मौत का ताडंव लगता है
मौत भी क्या मौत दे
जिन्दा लाशो का ढेर लगता है
चाबी  भरकर चलता-सा
ये पुरा जहां लगता है।

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गुन्हा

ये उनका गुन्हा था
या हम ही कुछ
ऐसा कर बैठे।
अनजानी राहों पर जो
खुद को ले जाने पर
मजबूर कर बैठे।
हर पल की ताबीर
को साथ लेकर
एक तस्वीर तो
बना ली हमने।
पर उस को जहां के सामने
नुमाइस कर गुन्हा कर बैठे।
और इस दौर-ऐ- तिजारत में
खुद को ही गवा बैठे।

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मोती थी मैं

7bcc6be092d4e42b1e8d4da5d5f84c80मोती थी जब तक सिप में थी
डोलती, घुमती बस मदहोश थी
उस समुद्र ने फिर छोड़ दिया
अन्जाने किनारे को सोंप दिया
बस अब तो नाम ही है साथ
बाकी तो खुला है आकाश
पत्तरो में अपना वजुद खोजते है
इस दुनिया कि रंगीनी से डरते है
या तो कोई माला में पिरोऐगा
या हंस कोई चुग जाएगा।

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जुस्तजु

हँस हम भी लेते है जालिंम ,
जमाने को देखकर।
पर दर्दे-ए-दिल का आलम,
बया तन्हाईया ही करेगी।
जी रहे किस तरह
ओढ  लबादा-ए-दरोग़।
जुस्तजु-ए-दिल तो
बया खामोशियाँ ही करेगी॥

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नींद आती नहीं

वो तब भी कुछ ओर थे,
ओर अब भी कुछ ओर है।
वो हमे जाने नहीं,
ओर हम उन्हे पहचाने नहीं।

बढ़ाते रहें कुछ इस तरह,
हम जिन्दगी का सफर।
जिसमे उसने कुछ खोया नहीं,
ओर हमने कुछ पाया नहीं।

भरी उड़ान हमने भी,
उस पंछी की तरह।
उसने कोई राह सोची नहीं,
ओर हम कहीं पहोचे नहीं।

दर्द कि आवाज पहुँच जाए,
पत्तर का सीना भी चिर कर।
पर उसने कुछ सुना नहीं,
ओर हमने कुछ कहा नहीं।

देखेगे ख्वाब हम भी,
नुर-ऐ-परछाई का।
पर उसकी नींद जाती नहीं,
ओर हमे नींद आती नहीं।

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ऐसे में तेरी याद बहुत आती है

वो छम-छम सी झन्कार
जैसे पायल कि आवाज
वो बारीस कि फुआर
संगीत कोई सुनती है
बिजली बिगुल कोई बजाती है
वो सोन्धी सोन्धी सी महक
रुह मे कही बस जाती है
ऐसे में तेरी याद बहुत आती है
अब नया सा है हर ओर
धुला सा है भोर
गुम हो गए है सोर
सन्टा है हर ओर
कही से होरन कि आवाज आती है
चिडिया भी चीं-चीं चिलाती है
पत्ते से एक बुन्द
हथेली पर गिर जाती है
ऐसे में तेरी याद बहुत आती है।